कहते हैं कि पत्थर की लकीर को मिटाया नहीं जा सकता, लेकिन भारत का संविधान पत्थर की लकीर नहीं, बल्कि एक बहती हुई नदी है। साल 1950 में जब The Constitution of India यानि भारत का संविधान बनकर तैयार हुआ, तो इसे दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान कहा गया। लेकिन वक्त बदला, सरकारें बदलीं और बदलीं देश की ज़रूरतें। पिछले सात दशकों में इस किताब पर 100 से भी ज़्यादा बार कलम चली है। कभी अधिकारों को छीनने के लिए, तो कभी न्याय दिलाने के लिए। khabardaari.com की इस स्पेशल रिपोर्ट में आज हम उन 5 अनुच्छेदों के बारे में जानकारी देंगे, जिन्हें राजनीति और वक्त की ज़रूरत ने सबसे ज़्यादा बार बदला। ये वो अनुच्छेद हैं जो संविधान की रीढ़ भी हैं और विवादों का अखाड़ा भी।
भारतीय लोकतंत्र में सबसे ज्यादा बदले गए 5 संवैधानिक अनुच्छेद
अनुच्छेद 368: संविधान का सबसे शक्तिशाली अनुच्छेद माना जाता है। क्योंकि यही वह अनुच्छेद है, जिसके दम पर संसद को संविधान में संशोधन करने की अनुमति मिलती है।
शुरुआत में तो इस अनुच्छेद को लेकर कई सवाल उठे कि क्या सांसद सीमित अधिकारों के साथ भी संविधान बदल सकते हैं या नहीं? हालांकि 1973 में केशवानंद भारती केस के बाद Basic Structure Doctrine सामने आई। जिसके तहत संसद संविधान का मूल ढांचा नहीं बदल सकती।
इसके बाद अनुच्छेद 368 में कई बार संशोधन हुआ। ताकि संसद और न्यायपालिका के बीच अच्छा संतुलन बना सके।
अनुच्छेद 356: इस अनुच्छेद के तहत राष्ट्रपति देश के किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा सकता है। इस ताकत के चलते यह अनुच्छेद सबसे ज्यादा विवादित भी रहा है। 1960 से 80 के दशक में कई बार इसका दुरुपयोग हुआ। केंद्र सरकार, राज्य सरकारों को बर्खास्त करती रही। मगर 1994 में एस. आर. बोम्मई केस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुच्छेद पर कड़ी कस दी कि अगर राष्ट्रपति शासन किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन का फैसला भी करता है तो इसकी न्यायिक समीक्षा होगी। अब यह अनुच्छेद एक राजनीतिक हथियार नहीं बल्कि आखिरी विकल्प बनकर रह गया है।
इस अनुच्छेद के दम पर जम्मू कश्मीर में सबसे लंबी अवधि के लिए राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था। जबकि मणिपुर में सबसे ज्यादा बार राष्ट्रपति शासन लागू हुआ है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र और दिल्ली सहित दूसरे कई और राज्य में भी कई बार 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की घोषणा की गई थी।
अनुच्छेद 19: इसके तहत किसी भी नागरिक को अभिव्यक्ति, संगठन, आवागमन और व्यापार करने की स्वतंत्रता मिलती है। लेकिन यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं बल्कि उचित प्रतिबंधों के अधीन मिलती है। समय-समय पर राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के चलते इस अनुच्छेद में कई बार संशोधन किया जा चुका है। साथ ही आईटी कानून, ऑनलाइन कंटेंट रेगुलेशन और साइबर सुरक्षा से जुड़े मामलों में भी अनुच्छेद 19 कई बार संशोधित हुआ है।
उदाहरण के तौर पर भारत के नागरिक होने के नाते आप इंटरनेट इस्तेमाल करने की आजादी रखते हैं। लेकिन सरकार किन्हीं खास कारणों से आपके एरिया या संपूर्ण देश के इंटरनेट को कुछ घंटों या दिनों या आपातकाल की स्थिति में महीनों तक के लिए बंद कर सकती है। आमतौर पर ऐसा परीक्षाओं के दौरान किया जाता है।
अनुच्छेद 31: ये कभी मौलिक अधिकारों का हिस्सा हुआ करता था और नागरिकों को संपत्ति का अधिकार देता था। लेकिन 44वें संविधान संशोधन (1978) के जरिए अनुच्छेद 31 को हटा दिया गया है। अब संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटकर कानूनी अधिकार बना दिया गया है।
अनुच्छेद 74: यह साफ करता है कि भारत में असली सत्ता किसके हाथों में होती है। इस अनुच्छेद के अनुसार राष्ट्रपति देश के लीडर तो होते हैं, लेकिन वे मंत्रिपरिषद यानी कि प्रधानमंत्री और मंत्रियों की सलाह पर ही काम करते हैं। शुरुआत में संविधान में यह बात पूरी तरह से स्पष्ट नहीं थी कि राष्ट्रपति मंत्री की सलाह मानने के लिए मजबूर है या नहीं। इस वजह से कई बार यह अनुच्छेद सवालों के कटघरे में रखा गया।
लेकिन 42 वें संविधान संशोधन के बाद फैसला कर दिया गया कि राष्ट्रपति को मंत्री परिषद की सलाह माननी ही होगी। हालांकि आगे चलकर 44वें संविधान संशोधन में यह व्यवस्था जोड़ी गई कि राष्ट्रपति एक बार सलाह पर दोबारा विचार करने के लिए कह सकता है। लेकिन दूसरी बार की दी गई सलाह स्वीकार ही करनी पड़ेगी। अनुच्छेद 74 से यह साफ होता है कि राष्ट्रपति के सभी फैसले प्रधानमंत्री और मंत्रियों के फैसले होते हैं।












